काश के वो सावन फिर से आ जाये।

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सावन आकर भी नहीं आया।
जो झूला कभी हुआ करता था।।
जो मिट्टी भीगती थी कभी आंगन में।
वह घेवर का स्वाद फिर से याद आया।।
सावन आकर भी नहीं आया।
वो बुआ का घर पर आना।
भाई बहनों का कपड़े दिखाना।
वो मेले में जाना याद आया।
सावन आकर भी नहीं आया।

वो मां का हाथों में चूड़ियां सजाना।
पापा का घर पर सामान लाना।
बाबा की कचोरी खाना याद आया।
सावन आकर भी नहीं आया।

फिर से वही आंगन का झूला
वो मिट्टी की खुशबू फिर से आ जाए।
सखियों संग मेले में अठखेलियां हो जाए।
अम्मा का गाना मिल जाए कहीं से
काश वो सावन फिर से आ जाए।
काश वो सावन फिर से आ जाए।

गीतिका अग्रवाल “गीत”

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17 Comments

  1. Arvind Prabhat
    Arvind Prabhat on

    वाह गीतिका जी वाह बहुत सुंदर पंक्तियां।

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