रुद्र की क्रोधाग्नि का विग्रह हैं काल भैरव

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पौराणिक आख्यान है कि एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है। इस पर दोनों देवताओं ने अपने-अपने को श्रेष्ठ बताया। इसके बाद देवताओं ने वेद शास्त्रों से पूछा कि सबसे श्रेष्ठ कौन है तो वेद शास्त्रों ने कहा कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया है वह अनादि, अनंत ओर अविनाशी तो भगवान शंकर ही है।
वेद शास्त्रों से भगवान शिव के बारे में यह सुनकर ब्रह्मा ने अपने पांचवें मुख से शिव के लिए भला बुरा कहा। इससे वेद शास्त्र दुखी हुए। उसी समय एक दिव्य ज्योति के रूप में भगवान रुद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे शिव तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो, अधिक रुदन करने से मैंने ही तुम्हारा नाम रुद्र रखा था, इसलिए तुम मेरी सेवा करो। ब्रह्मा जी के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव को उत्पन्न करके कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। उस दिव्य शक्ति सम्पन्न भैरव ने अपने बायें हाथ की सबसे छोटी उंगली के नाखून से ब्रह्मा के उस पांचवें सिर को काट डाला जिसने शिव के बारे में अपमानजनक शब्द कहे थे।
शिव ने अपने क्रोध के उस प्रचण्ड रूप को बाद में काशी का कोतवाल बनाया था। इसके बाद ही काल भैरव की पूजा होने लगी। मध्य प्रदेश में काल भैरव का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इनकी पूजा से घर में नकारात्मक ऊर्जा, जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से करीब 8 किमी दूर, क्षिप्रा नदी के तट पर कालभैरव मंदिर बना है। कहते हैं कि यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना है। यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर माना जाता है, जहां मांस, मदिरा, बलि और मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। बताते हैं प्रारंभ में यहां सिर्फ तांत्रिकों को ही आने की अनुमति थी। बाद में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल दिया गया था।
यहां पर कुछ अर्से पहले तक जानवरों की बलि चढ़ाने की भी परंपरा थी। हालांकि अब यह प्रथा बंद कर दी गई है, लेकिन भगवान भैरव को मदिरा का भोग लगाने की परंपरा अब भी कायम है। काल भैरव मंदिर में भगवान को मदिरा पिलाने का चलन सदियों पुराना बताया जाता है लेकिन, यह कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ, यह कोई नहीं जानता।
मंदिर के पुजारियों के हवाले से बताया जाता है कि स्कंद पुराण में जहां इस स्थान के धार्मिक महत्व का जिक्र किया गया है, वहीं एक कहानी है। इस कहानी के अनुसार चार वेदों के रचयिता ब्रह्मा जी ने जब पांचवे वेद की रचना करने के बारे में सोचा तो उन्हें रोकने के लिए देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की।
जब ब्रह्मा जी ने शिव की बात नहीं मानी तो क्रोध में उन्होंने अपने तीसरे नेत्र से बटुक भैरव को प्रकट किया। बालक बटुक भैरव ने गुस्से में ब्रह्मा जी का पांचवां मस्तक काट दिया। जिससे उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस पाप दोष से मुक्त होने का प्रयास करने पर भी उन्हें किसी स्थान पर मुक्ति नहीं मिली। तब भैरव ने भगवान शिव की आराधना की, जिन्होंने बताया कि उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर ओखर श्मशान के पास तपस्या करने से उन्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है। उसी समय से यहां काल भैरव की पूजा हो रही है। यहां एक बड़ा मंदिर बनाया गया था, जिसका जीर्णोद्धार परमार वंश के राजाओं ने करवाया था।
मदिरा के भोग का असली रहस्य क्या है ये कोई नहीं जान पाया, कई लोगों ने इस रहस्य को जानने की कोशिश जरूर की, कि आखिर मदिरा का पात्र मूर्ति के मुंह के पास जाते ही खाली कैसे हो जाता है, और सारी मदिरा जाती कहां है। एक किवदंती के अनुसार मंदिर में जहां काल भैरव की मूर्ति के सामने झूले में बटुक भैरव की मूर्ति विराजमान है, एक अंग्रेज
अधिकारी ने आजादी के पूर्व वहां आसपास की गहन खुदाई करवायी थी। ये खुदाई काफी गहराई तक करवायी गई थी लेकिन कुछ भी पता नहीं चला। मंदिर की बाहरी दीवारों पर अन्य कई देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। इसके सभागृह के उत्तर में पाताल भैरवी नाम की एक छोटी सी गुफा भी है।

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Pankaj Tyagi

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