शर्मिंदा हूँ मैं

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आज सांसों के भरोसे, ज़िन्दा हूँ मैं,
सच कहूँ बहुत शर्मिंदा हूँ मैं।
अस्तित्व की तलाश में फिरती हूं दरबदर,
अपना ही अक्स नहीं आता कहीं नज़र।
खो गया है जैसे मेरा ही अपना साया,
किया क्या है जि़न्दगी में पूछता मेरा परछाया।
जवाब दूँ भी क्या किसी को शर्मिन्दा हूं मैं,
क्यूकि इन सांसों के भरोसे जिंदा हूं मैं।

-गीतिका

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Arvind Prabhat

14 Comments

  1. जवाब नही है लेकिन …..लाजवाब …बेहतरीन👌👍👍आगे भी ऐसी ही पोस्ट करते रहना…बहुत खूब

  2. किया क्या है जि़न्दगी में पूछता मेरा परछाया।
    जवाब दूँ भी क्या किसी को शर्मिन्दा हूं मैं,
    Ye shi he..

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